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शिक्षक बना ‘अपराधी’, शिक्षा बनी ‘राजनीति’ का हथियार

क्या यही है अमृतकाल? शिक्षक पर FIR और बंद हो रहे स्कूल, अखिलेश यादव का योगी सरकार पर हमला
News Desk
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16 Jul 2025
02:04 AM
1 min read
शिक्षक बना ‘अपराधी’, शिक्षा बनी ‘राजनीति’ का हथियार
हाइलाइट्स
क्या यही है अमृतकाल
शिक्षक पर FIR और बंद हो रहे स्कूल, अखिलेश यादव का योगी सरकार पर हमला

लखनऊ -  उत्तर प्रदेश में कविता पढ़ाने वाले शिक्षक पर दर्ज एफआईआर को लेकर सियासत गरमा गई है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस पूरे प्रकरण को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के ‘अमृतकाल’ पर करारा तंज बताया है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब शिक्षक पर एफआईआर हो और हजारों स्कूल बंद किए जा रहे हों, तो क्या यही है ‘अमृतकाल’?

बरेली के एक शिक्षक रजनीश गंगवार का वीडियो वायरल हुआ, जिसमें वे स्कूल की प्रार्थना सभा में कांवड़ यात्रा को लेकर एक कविता सुना रहे थे—
"तुम कांवड़ लेने मत जाना, तुम ज्ञान का दीप जलाना…"
इस कविता को कुछ संगठनों ने धर्म विरोधी बताते हुए शिक्षक के खिलाफ शिकायत दर्ज कर दी। इसके बाद पुलिस ने शिक्षक पर एफआईआर दर्ज की, जिससे मामला राजनीतिक रंग ले चुका है।

शिक्षक पर कार्रवाई या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला?

अखिलेश यादव ने इस मामले को लेकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर सरकार पर तीखा प्रहार किया और लिखा: "शिक्षक पर FIR और शिक्षालय बंद हो रहे हैं… भाजपा के लिए क्या यही अमृतकाल है?"

इसके साथ ही उन्होंने राज्य में 5,000 से अधिक सरकारी स्कूलों को बंद किए जाने के निर्णय को भी सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़ा करने वाला कदम बताया।

क्या है पूरा मामला?

बरेली ज़िले के बहेड़ी इलाके के एक इंटर कॉलेज में शिक्षक रजनीश गंगवार ने स्कूल असेंबली के दौरान विद्यार्थियों को एक कविता सुनाई। कविता का उद्देश्य ज्ञान, शिक्षा और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देना था, लेकिन कुछ संगठनों ने इसे धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला बताया।

हिंदू संगठनों का कहना है कि जब सरकार कांवड़ यात्रा की भव्य तैयारियां कर रही है, तो एक शिक्षक इस तरह की कविता सुना कर धार्मिक माहौल बिगाड़ने का प्रयास कर रहा है। पुलिस ने मामले में शिक्षक के खिलाफ आईपीसी की धाराओं में एफआईआर दर्ज की है।

न्यायिक और नागरिक संगठन भी आए समर्थन में

पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) जैसे नागरिक संगठन इस FIR को अनुचित मानते हैं। उनका कहना है कि कविता में किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ कोई आपत्तिजनक टिप्पणी नहीं थी, और यह केवल शिक्षा के महत्व पर आधारित थी।

 

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