आइबी कर्मचारी अंकित शर्मा हत्याकांड में कड़कड़डूमा कोर्ट का विस्तृत फैसला अब इस मामले की जांच और अभियोजन की पूरी तस्वीर सामने लेकर आया है। अदालत ने पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन समेत पांच आरोपितों को दोषी ठहराते हुए स्पष्ट किया कि यह फैसला किसी एक गवाह या एकमात्र साक्ष्य पर आधारित नहीं है। अदालत के अनुसार अभियोजन द्वारा पेश किए गए 91 गवाहों, वैज्ञानिक और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, फोरेंसिक जांच, वीडियो फुटेज, कॉल डिटेल रिकॉर्ड और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की एक-दूसरे से जुड़ी श्रृंखला ने हत्या के आरोपों को संदेह से परे स्थापित किया।
दोषसिद्धि के बाद अदालत ने सजा के बिंदु पर सुनवाई के लिए 23 जुलाई की तारीख निर्धारित की है। उस दिन अभियोजन और बचाव पक्ष की दलीलें सुनने के बाद सजा पर फैसला सुनाया जाएगा।
अदालत ने अपने 320 पन्नों के फैसले में कहा कि मामले में प्रस्तुत प्रत्येक प्रकार के साक्ष्य का अलग-अलग और सामूहिक रूप से परीक्षण किया गया। न्यायालय के अनुसार प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, पुलिस अधिकारियों की गवाही, चिकित्सकीय और फोरेंसिक रिपोर्ट, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड तथा अन्य दस्तावेजी साक्ष्य एक-दूसरे की पुष्टि करते हैं।
फैसले में कहा गया है कि अभियोजन ने घटनाक्रम को विभिन्न साक्ष्यों के माध्यम से इस प्रकार जोड़ा कि पूरी घटना की श्रृंखला स्पष्ट रूप से स्थापित हो गई और आरोपों को संदेह से परे साबित किया जा सका।
फैसले में चांदबाग पुलिया के पास मौजूद प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों का भी विस्तृत उल्लेख किया गया है। अदालत ने कहा कि गवाहों द्वारा बताए गए घटनाक्रम का मिलान वीडियो फुटेज, चिकित्सकीय दस्तावेजों और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों से किया गया, जिनमें पर्याप्त समानता पाई गई। न्यायालय के अनुसार गवाहों के बयानों में घटना के मूल तथ्यों को लेकर पर्याप्त सामंजस्य रहा, जिससे अभियोजन का पक्ष मजबूत हुआ।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि दंगों जैसी असाधारण परिस्थितियों में अलग-अलग प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों में छोटे-मोटे अंतर होना स्वाभाविक है। ऐसे सामान्य विरोधाभासों के आधार पर पूरी गवाही को अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता।
फैसले में उच्चतम न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि यदि किसी गवाही का मूल स्वरूप विश्वसनीय हो और उसे स्वतंत्र साक्ष्यों का समर्थन प्राप्त हो, तो मामूली विसंगतियां दोषसिद्धि में बाधा नहीं बनतीं।
न्यायालय ने वैज्ञानिक साक्ष्यों को भी महत्वपूर्ण आधार माना। फैसले में फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (एफएसएल) की रिपोर्ट, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, घटनास्थल से एकत्र किए गए साक्ष्य, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड, मोबाइल फोन की कॉल डिटेल रिकॉर्ड, लोकेशन संबंधी जानकारी तथा अन्य डिजिटल सामग्री का उल्लेख किया गया है। इसके अलावा चिकित्सकों, फोरेंसिक विशेषज्ञों, जांच अधिकारियों और मोबाइल कंपनियों के नोडल अधिकारियों की गवाही को भी अदालत ने विश्वसनीय माना।
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने गवाहों की विश्वसनीयता, पहचान, प्राथमिकी दर्ज होने में हुई देरी, जांच की निष्पक्षता तथा इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों पर सवाल उठाए थे। अदालत ने इन सभी दलीलों पर विचार करने के बाद कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों की समग्र श्रृंखला अभियोजन के मामले का समर्थन करती है और आरोपों को संदेह से परे स्थापित करने के लिए पर्याप्त है।
अभियोजन की ओर से अदालत में कुल 91 गवाह पेश किए गए। इनमें प्रत्यक्षदर्शी, पुलिस अधिकारी, चिकित्सक, फोरेंसिक विशेषज्ञ, जांच अधिकारी, मोबाइल कंपनियों के नोडल अधिकारी और अन्य औपचारिक गवाह शामिल थे। अदालत ने कहा कि इन सभी गवाहों की गवाही और वैज्ञानिक साक्ष्यों के संयुक्त मूल्यांकन के आधार पर पांचों आरोपितों को दोषी ठहराया गया।
दोषसिद्धि के बाद अब मामले में अगला चरण सजा निर्धारण का होगा। 23 जुलाई को अदालत अभियोजन और बचाव पक्ष की दलीलें सुनने के बाद दोषी ठहराए गए आरोपितों की सजा पर अपना निर्णय सुनाएगी।
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