एक आवाज गरजती है। ये क्या हिंदू का खून है, ये क्या मुसलमान का खून है, बता इसमें हिंदू का खून कौन सा है और मुसलमान का खून कौन सा है। फिल्म क्रांतिवीर का यह डायलॉग नाना का केवल संवाद भर नहीं था। इसे बोलते समय उनकी आवाज में एक छटपटाहट थी, बेचैनी थी। कारण, नाना किसी भी चरित्र को महज निभाते भर नहीं थे, बल्कि उसमें ऐसा डूब जाते थे, मानो आसपास कोई बोल रहा है। नाना में खुरदरापन था, तड़प थी, देशीपन था, पीड़ा थी। और सबसे बड़ा था उनके मूल जीवन का यथार्थ।
35 रुपये महीने की नौकरी करते रहे, लेकिन रंगमंच को नहीं छोड़ा। गरीबी और संघर्ष के मेल ने उन्हें निराश नहीं किया, बल्कि तराश दिया। यही मूल भाव उनके अभिनय को जीवंत बना देता था। अभिनेता राजकुमार की तरह उन्हें भी कुछ समीक्षाकार स्टाइलिश भर मानते रहे, परन्तु हकीकत में उनका निजी अनुभव उनकी स्टाइल को भी बेहतर अभिनय का मुकाम दे देता था। नाना के जाने की खबर सिर्फ सिनेमा के एक अभिनेता के जाने की खबर नहीं है। यह उस आवाज के खामोश हो जाने की खबर है, जो पर्दे पर गूंजती थी, तो लगता था कि समाज बोल रहा है।उसमें बनावट नहीं थी, चमक-दमक नहीं थी। उसमें गुस्सा था, दर्द था और सच बोलने की बेचैनी थी।
नाना उन कलाकारों में थे, जिन्हें देखकर यह महसूस होता था कि अभिनय सीखा नहीं गया, बल्कि जिंदगी से निकाला गया है।

किशोरावस्था में नाना स्कूल के बाद फिल्मी पोस्टरों में रंग भरने का काम करते थे। इसके लिए उन्हें महीने के करीब 35 रुपये और एक वक्त का खाना मिलता था। वह कई किलोमीटर पैदल चलकर काम पर जाते थे। यही वह दौर था जब उन्होंने गरीबी को बाहर से नहीं, भीतर से जाना। इसीलिए जब उन्होंने गरीब, मजदूर, बेरोजगार, विद्रोही या टूटे हुए आदमी का किरदार निभाया, तो वह ईमानदार लगता था।
फिल्मों में उनकी शुरुआत छोटी भूमिकाओं से हुई और लंबे समय तक उन्हें वह पहचान नहीं मिली, जिसके वह हकदार थे। पर, नाना ने कभी अपने अभिनय को सिर्फ रोजी-रोटी का जरिया नहीं माना। वह भूमिका चुनते थे, उसमें उतरते थे और उसे अपना बना लेते थे। परिंदा और प्रहार जैसी फिल्मों ने उन्हें एक अलग पहचान दी और क्रांतिवीर ने उन्हें घर-घर पहुंचा दिया।

नाना को सिर्फ आक्रोशित अभिनय करने वाला समझना उनके साथ अन्याय होगा। फिल्म वेलकम के उदय शेट्टी की याद करिए। इस रोल में दर्शकों को खूब हंसाया। इससे साबित हुआ कि जिस अभिनेता को लोग गंभीर और विद्रोही भूमिकाओं के लिए जानते हैं, उसके भीतर हास्य की भी उतनी ही गहरी समझ है। दिलीप कुमार की भांति नाना भी किसी एक खांचे में बंधे नहीं थे।
देशभक्ति भी उनके जीवन का एक प्रबल पक्ष था। उन्होंने प्रादेशिक सेना का प्रशिक्षण लिया था और कारगिल युद्ध के समय सैनिकों के बीच जाने की इच्छा जताई थी। वह युद्ध क्षेत्र तक गए और सैनिकों के बीच समय बिताया। प्रहार फिल्म में वह कमांडो की दमदार भूमिका में सबका दिल जीत ले गये थे।

नाना सामाजिक सरोकारों से दिल से जुड़े थे। महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्याओं और सूखे ने उन्हें भीतर से झिंझोड़ दिया था। उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर 'नाम' फाउंडेशन के जरिये किसानों और गांवों के लिए काम शुरू किया। पानी, खेती और गांवों की बुनियादी जरूरतों से जुड़े कार्यों को उन्होंने भरपूर समय दिया। यह कार्य नाना ने बिना किसी प्रचार के बड़ी खामोशी से किया।
दरअसल नाना फिल्म इंडस्ट्री के कभी रहे ही नहीं। इसकी स्वीकारोक्ति उन्होंने केबीसी के मंच पर अमिताभ बच्चन के सामने की थी। नाना की नाराज़गी अनेक बार उनके लिए मुसीबत भी लेकर आती। वर्ष 2018 में अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने उन पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए, जिन्हें नाना ने खारिज किया। बाद में पुलिस ने पर्याप्त सबूत न मिलने का हवाला देते हुए मामला बंद करने की रिपोर्ट दाखिल कर दी।
नाना में गुस्सा था, तो विनम्रता भी।
उनके अभिनय का सबसे महत्वपूर्ण पहलू उनकी आवाज थी, लेकिन उनकी आवाज के पीछे उनका मूल जीवन था।
नाना ने सफलता के शीर्ष पर पहुंचकर भी अहंकार को गले नहीं लगाया। मनुष्यता से लबरेज़ थे।
नाना पाटेकर का जाना सचमुच अखर गया। बहुत याद आओगे नाना। विनम्र श्रद्धांजलि।
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