उत्तर प्रदेश का सोनभद्र जिला कभी नक्सल गतिविधियों और जन अदालतों के कारण राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहता था। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और बिहार की सीमाओं से लगे इस इलाके की पहचान लंबे समय तक सुरक्षा चुनौतियों और सीमित विकास से जुड़ी रही। अब इसी क्षेत्र की तस्वीर बदलती नजर आ रही है। स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी आदिवासी महिलाएं श्रीअन्न और पारंपरिक खाद्य उत्पाद तैयार कर न केवल स्वरोजगार हासिल कर रही हैं, बल्कि उनके उत्पाद स्थानीय बाजारों से निकलकर दूसरे राज्यों तक पहुंच रहे हैं।
प्रशासन के अनुसार, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत महिलाओं को प्रशिक्षण, वित्तीय सहयोग, आधुनिक पैकेजिंग और विपणन की सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। इसके बाद कई समूहों ने श्रीअन्न आधारित उत्पादों के निर्माण को आजीविका का माध्यम बनाया है।
चार राज्यों की सीमा से लगे सोनभद्र के कई गांव लंबे समय तक बुनियादी सुविधाओं की कमी और सीमित आर्थिक अवसरों का सामना करते रहे। जिला प्रशासन का कहना है कि हाल के वर्षों में सड़क, बिजली, पेयजल और शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं का विस्तार होने के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी योजनाओं की पहुंच बढ़ी है। इसके साथ ही स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं को आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने पर भी विशेष ध्यान दिया गया।
मुख्य विकास अधिकारी जागृति अवस्थी के अनुसार, पहले जिन गांवों की पहचान असुरक्षा और पिछड़ेपन से होती थी, वहां आज महिलाएं अपने उत्पाद तैयार कर बाजार तक पहुंचा रही हैं। इससे परिवारों की आय बढ़ी है और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी विकसित हुए हैं।
क्षेत्र की महिलाओं ने रागी, सांवा, अलसी और महुआ जैसे पारंपरिक उत्पादों को आधुनिक पैकेजिंग के साथ बाजार में उतारना शुरू किया है। स्वयं सहायता समूहों द्वारा रागी के लड्डू, अलसी के लड्डू, मिलेट कुकीज़, बिस्कुट, नमकीन और अन्य पौष्टिक खाद्य उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं।
इन उत्पादों की मांग स्थानीय बाजारों के साथ-साथ अन्य जिलों और राज्यों से भी मिलने लगी है। प्रशासन का कहना है कि इससे महिलाओं की आय बढ़ने के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिली है।
विकास खंड घोरावल में संचालित दुर्गा स्वयं सहायता समूह से जुड़ी 15 से अधिक महिलाएं श्रीअन्न उत्पादों के निर्माण और बिक्री से हर महीने 40 से 50 हजार रुपये तक का कारोबार कर रही हैं। इससे समूह से जुड़ी प्रत्येक महिला को सालाना लगभग एक लाख रुपये की अतिरिक्त आय प्राप्त हो रही है।
सुदूर आदिवासी बहुल म्योरपुर विकास खंड के लिलासी गांव में संचालित खुशबू आजीविका स्वयं सहायता समूह भी इसी दिशा में काम कर रहा है। समूह से जुड़ी सुनीता देवी, प्रियंका, संगीता, हीरामनी सहित 14 महिलाएं महुआ के लड्डू और सांवा चावल जैसे पारंपरिक उत्पाद तैयार कर रही हैं। प्रशासन के अनुसार, इनके उत्पादों की मांग अब स्थानीय बाजार से आगे बढ़कर अन्य राज्यों से भी आने लगी है।
जिला प्रशासन का कहना है कि राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन का उद्देश्य केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि महिलाओं को प्रशिक्षण और कौशल विकास के माध्यम से उद्यमी के रूप में विकसित करना है। इसी मॉडल के तहत स्वयं सहायता समूहों को उत्पादन, गुणवत्ता, पैकेजिंग और विपणन के विभिन्न पहलुओं पर प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
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