Supreme Court: उच्चतम न्यायालय ने आरक्षण से जुड़े एक मामले में गुरूवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि हिंदू धर्म से इस्लाम अपनाने वाला व्यक्ति अपने पूर्व सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर पिछड़ा वर्ग श्रेणी में आरक्षण का दावा नहीं कर सकता। न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति चंद्रशेखर की पीठ ने मद्रास उच्च न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखते हुए इस मामले पर यह टिप्पणी की है।
सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय ने कहा कि हिंदू सामाजिक व्यवस्था से किसी अन्य धार्मिक व्यवस्था में जाने के बाद व्यक्ति केवल धर्म परिवर्तन से पहले की सामाजिक स्थिति के आधार पर संविधान के अनुच्छेद 16(4) के तहत आरक्षण का दावा नहीं कर सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि पहले की सामाजिक व्यवस्था का पिछड़ापन नए धर्म में पिछड़े वर्ग का दर्जा पाने का स्वतः आधार नहीं बन सकता।
कोर्ट ने संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 का भी जिक्र किया। इसके तहत अनुसूचित जाति का दर्जा निर्धारित धार्मिक शर्तों से जुड़ा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धर्म परिवर्तन कर लिये जाने के बाद पहले वाला सामाजिक दर्जा स्वतः जारी नहीं रह सकता। वहीं फिर से हिंदू धर्म अपनाने पर भी पिछड़े वर्ग का पुराना दर्जा बहाल नहीं हो जाता।
क्या है यह मामला
यह मामला 9 मार्च 2024 के तमिलनाडु सरकार के एक सरकारी आदेश से संबंधित है। इस आदेश में पिछड़ा वर्ग, अति पिछड़ा वर्ग, विमुक्त समुदायों और अनुसूचित जातियों से जुड़े लोगों को इस्लाम अपनाने के बाद ‘पिछड़ा वर्ग मुस्लिम’ श्रेणी में शामिल करने की अनुमति देने का प्रावधान था। मामले में याचिकाकर्ता ने धर्म परिवर्तन करने के बाद मुस्लिम लेब्बाई समुदाय का प्रमाणपत्र हासिल करना चाहा।
लेकिन तहसीलदार द्वारा आवेदन खारिज कर दिया गया। जिसके बाद उसने मद्रास उच्च न्यायालय में इस संबंध में याचिका दायर की थी। हालांकि उच्च न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी थी। इसके साथ ही कोर्ट ने राज्य सरकार के संबंधित आदेश को असंवैधानिक ठहराया था। इसके बाद मामला उच्चतम न्यायालय पहुंचा था। उच्चतम न्यायाय ने भी मद्रास उच्च न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखा।
Explore Related Topics
टिप्पणियाँ
टिप्पणी करने के लिए लॉगिन करें